Sunday, February 19, 2012

ज़िन्दगी मेरी कुछ मर सी गयी है!!




डूबते  से  इस  भंवर  में  कुछ  तो  ये  फस  सी  गयी  है,
चाहती  है  आज  जीना  पर  ये  क्यों  मर  सी  गयी  है,
हंसना   चाहती  है  ये  लेकिन  आँसुओ  को  पी   रही  है, 
टूट  कर  बिखरे  हुए  पत्तो  के  जैसे  बिछ  गई   है,
देखना चाहती थी सपने अब तो चुप सी सो गयी है,
ना जाने क्यों  ज़िन्दगी मेरी कुछ मर सी गयी है!!


रौशनी  को  देख  कर  भँवरे   के  जैसे  उड़   चली  थी,
पर  अँधेरी  रात  के  जैसे  क्यों  बेवस  हो  गयी  है,  
आंसुओ  के  कहकहों  की  उलझनों  में  घिर  गयी  है,  
चाहती  है  फिर  से  उड़ना ,  पर  सिमट  कर   गिर   गयी  है,  
देखना चाहती थी सपने अब तो चुप सी सो गयी है,
ना जाने क्यों  ज़िन्दगी मेरी कुछ मर सी गयी है!!


प्यार  इसको  था  कभी  अब  तो  बस  शिकवा  मिली  है,
राह  में  चलते    हुए  बस  इसे   ठोकर  मिली  है,
देखना  था  दूर  उड़ कर   बादलो  में  खो  गयी  है,
जो  कभी  थी  आरजू   फरियाद  बनके  रह  गयी  है, 
देखना चाहती थी सपने अब तो चुप सी सो गयी है,
ना जाने क्यों  ज़िन्दगी मेरी कुछ मर सी गयी है!!


आग  थी  इसमें  कभी , कुछ  लड़ने  की  भी  बात  थी,
सबको  थामे  साथ  में  अब  तो  ये  झुक  सी  गयी  है, 
मस्त  खिलती  थी  कभी  पर  आज  कुछ  बह  सी  गयी  है,
एक   कहानी  थी  कभी  अब  तो  किस्सा  बन  गयी  है,
देखना चाहती थी सपने अब तो चुप सी सो गयी है,
ना जाने क्यों  ज़िन्दगी मेरी कुछ मर सी गयी है!!


दूर  देखा  है  शिखर  बस  सोच  के  ये  चल  पड़ी  है, 
पास  जाना  चाहती  है  डर  के  क्यों  ये  रुक  गयी  है,  
कहना  चाहती  थी  ये  कुछ  पर  सुन्न  न  पाए  हम  इसे,  
सांस  की  डोरी  है  थामे  लाऊ   तो  जैसे  भुज  गयी   है, 
देखना चाहती थी सपने अब तो चुप सी सो गयी है,
ना जाने क्यों  ज़िन्दगी मेरी कुछ मर सी गयी है!!


This is my first stint with HINDI, or HINDI POETRY if this at all qualifies to be a poem.
I know this is raw and a naive attempt, but still I am waiting for all your generous comments.  :)  :)